हिमालय की प्रतिज्ञा और अमृत!

हिमालय अब पूरी धरती का सबसे जीवंत स्थान बन गया था। हरी-हरी घास उसकी शिवालिक रूपी विशाल बाजुओं पर लहलहाती तो उसे रोंगटे खड़े होने जैसा एहसास होता। छोटे-छोटे पौधे जब पेड़ बन उसके धौलाधार सीने पर ऊँचे उठ झूमते तो अटल हिमालय का मन भी झूम उठता। विभिन्न रंग के फूल उसके पीर पंजाल काँधे को ढक लेते तो वह प्रसन्नता से मदहोश हो जाता। विभिन्न प्रकार के जीव उसपर दौड़ लगाते तो वह उनका स्पर्श अपने शीर्ष तक पाने को अधीर हो उठता। इसी तरह दिन, हफ़्ते और महीने बीतते चले जा रहे थे। बादल जल बरसा कर चले जाते और धरती अपनी मिट्टी में नमी समा पनपते जीवन को फलने फूलने में सहयोग करती।

पाँचवी चिट्ठी

सुबह के ६ बजे हैं, आँख खुली तो नज़र तुम्हारे चेहरे पर पड़ी। शांत चेहरा, ना कोई तनाव ना मुस्कान। जैसे उफनते समंदर पर किसी ने पहरा लगा दिया हो कि देख समंदर, अंदर के तूफ़ान की झलक भी बहार दिखाई ना पड़े। समंदर ने आँख मूँदी और अपने भीतर के हर तूफ़ान को सतह पर शांति ओढ़ ली। मैंने कई बार तुम्हें सोते में मुस्कुराते और सोते चेहरे पर ग़ुस्से के भाव उभरते भी देखा है। ना जाने नींद में भी तुम्हारे भीतर क्या उछलता कूदता है।

सुख दुख और डर

दुख, सुख और डर वो तीन पहलू हैं,
जिनका सामना हम लगभग हर दिन करते हैं,
हम सभी जीवन में केवल सुख ही चाहते हैं,
मगर दुख और डर हर वक़्त सुख के आस पास ही रहते हैं,
लोग कभी डर के साये में खड़े सुख को देख
उसकी ओर बढ़ने से संकोच करते हैं,
तो कभी सुख के साथ-साथ खड़े दुख को सोच
उसकी ओर बढ़ने से सकुचाते हैं।

आज़ाद और अचल प्रेम

तो चलो, प्रेम की एक नई परिभाषा रचते हैं,  बहती नदी सा आज़ाद, मगर पहाड़ सा अचल, प्रेम करते हैं, तुम नदी, मैं पहाड़, तुम जल, मैं पत्थर, तुम वादियाँ – वादियाँ बहती रहना, मैं हिमखंडों सा तुम में समाया रहूँ, मुझसे निकल एक सँकरी जल धारा सी, दुनिया में पहुँच,  जल का एक विशाल श्रोत बन जाना, मैं निहारता रहूँ अपनी ऊँचाइयों  से दूर तक , तुम कलरव करती बहती रहना, जो खारा समुंदर तुम्हें ख़ुद में समेटना चाहे, तो भाप बन छू मंतर हो जाना,  फिर ले रूप एक नन्हे बादल का,  मीलों दूर मुझ तक लौट आना,  बन कर सफ़ेद फ़ोहे सी बर्फ, मेरे माथे पर सज जाना,  ढक ना जाऊँ मैं तुमसे जब तक, यूँ ही मुझ पर बरसती रहना,  तो चलो, प्रेम की एक नई परिभाषा रचते हैं,  बहती नदी सा आज़ाद, मगर पहाड़ सा अचल, प्रेम करते हैं।

बिन परों का परिंदा

क्या आपने कभी धरती को ऊपर से देखा है?  नहीं नहीं, मैं विमान यात्रा वाली ऊँचाई की बात नहीं कर रहा। जब आप विमान में ऊपर उठते हैं तो क़रीब से आपको धरती नहीं केवल कंक्रीट के ढाँचे दिखते हैं और फिर आप पलक झपकते ही इतना ऊपर उठ जाते हैं कि धरती से दूरContinue reading “बिन परों का परिंदा”

मैं पेड़ हूँ 

पंछियों का घरौंदा,
तो पथिकों का आरामगाह,
बूढ़ों का साथी,
तो बच्चों का सारथी,
ना जाने मेरे कितने ही नाम हैं,
पर मैं तो केवल एक पेड़ हूँ,
एक बूढ़ा तनहा, सिसकता पेड़।

सफलता या सजगता?

मैं और आप हर दिन बदल रहे हैं। हम सभी आगे की ओर बढ़ रहे हैं। हर देश प्रगति की ओर अग्रसर है। मानव धरती से ऊँचा उठ, चाँद से होता हुआ ब्रहस्पति को पार कर अरुण (Uranus) ग्रह तक जा पहुँचा है। मगर इस यात्रा का परिणाम क्या है?  पैदा होने से जीवन के अंतContinue reading “सफलता या सजगता?”

पहाड़ से शहर को चिट्ठी

दिल में दबा मैं सब कुछ तो तुम्हें कभी कह ना सका मगर इस पत्ते को आज गाँव के बग़ल से होती हुई पहाड़ से शहर की ओर बहती नदी में बहा दे रहा हूँ। शायद तुम अब भी शाम ढले यमुना किनारे डूबते सूरज को देखने जाती होगी। किसी शाम जब किनारे पर नदी के पानी पैर ड़ुबाए बैठी होगी तो मेरी ये सूखी चिट्ठी तुम्हारे पैरों से आ लगेगी। उम्मीद है…

यादों का हाथ

तीसरे, से चौथे आयाम को जोड़ मैं असल दुनिया और नींद की दुनिया के बीच कहीं झूलता हुआ सुबह का इंतज़ार करने लगा। ना जाने वो सपना था या हक़ीक़त मगर मुझे अपनी उँगलियों की नोक पर तुम्हारे छुअन की गर्माहट महसूस हुई, जैसे तुमने मेरी उँगलियों के सिरे पर अपनी उँगलियों  के सिरे  रख दिये हों। मेरा रोम रोम सिहर उठा। क्या किसी दूसरे आयाम में तुमने भी मेरी ओर हाथ बढ़ाया था?

तुम सच हो या कल्पना

अंधेरी रातों में,
चाँद बन जाती हो,
सर्द सुबहों में,
गर्म चाय सी लबों को छू जाती हो,
लम्बे सफ़र की दुपहरी में,
पेड़ की छाओं सी मिल जाती हो,
जो ढलने लगे ख़यालों का सूरज,
तो रंगो सी फैल जाती हो,
तुम!
तुम सच हो या कल्पना?