चिड़िया कहाँ जाएगी?

इंसान बोरिया बिस्तर लिए,
दूसरे पहाड़ की ओर बढ़ गया,
अब एक नया गाँव बसाएँगे,
नई मिट्टी को रौंद,
पुराने पहाड़ की सीमेंट से
एक नया महल सजायेंगे,
हंसते खेलते जीवन को उजाड़,
जड़ पड़े निर्जीवता को बसायेंगे।

हिमालय की प्रतिज्ञा और अमृत!

हिमालय अब पूरी धरती का सबसे जीवंत स्थान बन गया था। हरी-हरी घास उसकी शिवालिक रूपी विशाल बाजुओं पर लहलहाती तो उसे रोंगटे खड़े होने जैसा एहसास होता। छोटे-छोटे पौधे जब पेड़ बन उसके धौलाधार सीने पर ऊँचे उठ झूमते तो अटल हिमालय का मन भी झूम उठता। विभिन्न रंग के फूल उसके पीर पंजाल काँधे को ढक लेते तो वह प्रसन्नता से मदहोश हो जाता। विभिन्न प्रकार के जीव उसपर दौड़ लगाते तो वह उनका स्पर्श अपने शीर्ष तक पाने को अधीर हो उठता। इसी तरह दिन, हफ़्ते और महीने बीतते चले जा रहे थे। बादल जल बरसा कर चले जाते और धरती अपनी मिट्टी में नमी समा पनपते जीवन को फलने फूलने में सहयोग करती।

पाँचवी चिट्ठी

सुबह के ६ बजे हैं, आँख खुली तो नज़र तुम्हारे चेहरे पर पड़ी। शांत चेहरा, ना कोई तनाव ना मुस्कान। जैसे उफनते समंदर पर किसी ने पहरा लगा दिया हो कि देख समंदर, अंदर के तूफ़ान की झलक भी बहार दिखाई ना पड़े। समंदर ने आँख मूँदी और अपने भीतर के हर तूफ़ान को सतह पर शांति ओढ़ ली। मैंने कई बार तुम्हें सोते में मुस्कुराते और सोते चेहरे पर ग़ुस्से के भाव उभरते भी देखा है। ना जाने नींद में भी तुम्हारे भीतर क्या उछलता कूदता है।

पूरा आकाश

मुझे आकाश देखना है,पूरा आकाश,पृथ्वी को हर ओर से घेरे हुएअनंत आकाश। बंटवारे के वक़्त इंसानों ने,अपने अपने हिस्से का सब बाँट लिया,जानवरों को पालतू और जंगलीपन में,पंछियों को शिकार और शिकारी वर्ग में,पेड़ों को आकर और फलों को स्वाद में,ज़मीन को सरहदों में,खुद को रंग व धर्मों में,अंत में रह गया आकाश। विशालकाय नीलाContinue reading “पूरा आकाश”

सुख दुख और डर

दुख, सुख और डर वो तीन पहलू हैं,
जिनका सामना हम लगभग हर दिन करते हैं,
हम सभी जीवन में केवल सुख ही चाहते हैं,
मगर दुख और डर हर वक़्त सुख के आस पास ही रहते हैं,
लोग कभी डर के साये में खड़े सुख को देख
उसकी ओर बढ़ने से संकोच करते हैं,
तो कभी सुख के साथ-साथ खड़े दुख को सोच
उसकी ओर बढ़ने से सकुचाते हैं।

विलुप्त सन्यासी

सन्यासी को आख़िरी बार कश्मीर और लद्दाख के बीच कहीं देखा गया था। हिमालय की सबसे लंबी व विशाल श्रृंखला पीर पंजाल के परे जाते देखा गया था। कश्मीर और लद्दाख में तो मनुष्यों ने मार्ग बना अपने आशियाने भी बसा लिये थे किंतु इनके मध्य में स्थित जाँसकर कि ओर जो भी गया वह कभी लौट कर ना आया और पार्वती की नगरी लाहौल से सटी यह पर्वतीय श्रृंखला एक राज ही बनी रही।

आज़ाद और अचल प्रेम

तो चलो, प्रेम की एक नई परिभाषा रचते हैं,  बहती नदी सा आज़ाद, मगर पहाड़ सा अचल, प्रेम करते हैं, तुम नदी, मैं पहाड़, तुम जल, मैं पत्थर, तुम वादियाँ – वादियाँ बहती रहना, मैं हिमखंडों सा तुम में समाया रहूँ, मुझसे निकल एक सँकरी जल धारा सी, दुनिया में पहुँच,  जल का एक विशाल श्रोत बन जाना, मैं निहारता रहूँ अपनी ऊँचाइयों  से दूर तक , तुम कलरव करती बहती रहना, जो खारा समुंदर तुम्हें ख़ुद में समेटना चाहे, तो भाप बन छू मंतर हो जाना,  फिर ले रूप एक नन्हे बादल का,  मीलों दूर मुझ तक लौट आना,  बन कर सफ़ेद फ़ोहे सी बर्फ, मेरे माथे पर सज जाना,  ढक ना जाऊँ मैं तुमसे जब तक, यूँ ही मुझ पर बरसती रहना,  तो चलो, प्रेम की एक नई परिभाषा रचते हैं,  बहती नदी सा आज़ाद, मगर पहाड़ सा अचल, प्रेम करते हैं।

चौथी चिट्ठी

जानता हूँ हर बार की तरह, ख़त का जवाब इस बार भी नहीं आएगा मगर हर ख़त की तरह इस बार भी मैं अपने सवाल भेज रहा हूँ। 

कहो तुम कैसी हो? सुबह की सैर पर जाना शुरू किया या अब भी सुबह का ख़ालीपन  बस अलसाई सी बिस्तर पर मेरी चाय का इंतज़ार करती काट देती हो? और फिर दफ़्तर के लिए देर हो जाने पर हड़बड़ा कर उठती होगी! है ना? उम्मीद है जल्द बाज़ी में टिफ़िन ले जाना तो नहीं भूलती होगी! शाम के सूरज में झलकता मेरा चेहरा धुंधला तो नहीं पड़  रहा? रात को किशोर कुमार की आवाज़ के संग मेरी याद भी तो चली आती होगी ना सिरहाने तक?